केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद को लेकर बड़ा दावा करते हुए कहा है कि 31 मार्च तक देश से नक्सलवाद पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा।
यह बयान भारत की आंतरिक सुरक्षा नीति के लिहाज़ से बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि दशकों से नक्सलवाद देश के कई हिस्सों में सुरक्षा और विकास के लिए चुनौती बना हुआ है।
अमित शाह का यह दावा न केवल सरकार की रणनीति को दर्शाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि केंद्र सरकार इस मुद्दे को अब निर्णायक मोड़ पर ले जाना चाहती है।
नक्सलवाद क्या है और यह कहां तक फैला रहा है?
नक्सलवाद एक वामपंथी उग्रवादी आंदोलन है, जिसकी शुरुआत 1960 के दशक में हुई थी। इसका प्रभाव लंबे समय तक:
- छत्तीसगढ़
- झारखंड
- ओडिशा
- महाराष्ट्र
- तेलंगाना
- मध्य प्रदेश
जैसे राज्यों के वन और आदिवासी क्षेत्रों में देखा गया।
इन इलाकों को कभी “रेड कॉरिडोर” कहा जाता था।
अमित शाह ने क्या कहा?
अमित शाह ने कहा कि:
- केंद्र सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस नीति अपनाई है
- सुरक्षा बलों के समन्वित अभियानों से नक्सल प्रभावित इलाकों में बड़ी सफलता मिली है
- हिंसा की घटनाओं और नक्सलियों की संख्या में तेज़ गिरावट आई है
- सरकार को भरोसा है कि 31 मार्च तक नक्सलवाद पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा
उन्होंने यह भी कहा कि अब सरकार का फोकस केवल सुरक्षा अभियान नहीं, बल्कि स्थायी शांति और विकास है।
सरकार की रणनीति: नक्सलवाद के खिलाफ बहुआयामी कार्रवाई
1. सुरक्षा अभियानों में तेजी
- CRPF, CoBRA और राज्य पुलिस के संयुक्त ऑपरेशन
- खुफिया जानकारी पर आधारित सटीक कार्रवाई
- नक्सल नेताओं को निशाना बनाकर नेटवर्क को कमजोर करना
2. इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास
- सड़कों, मोबाइल नेटवर्क और बिजली का विस्तार
- शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच
- आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन
3. सरेंडर और पुनर्वास नीति
- नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के लिए सरेंडर पॉलिसी
- आर्थिक सहायता और पुनर्वास कार्यक्रम
आंकड़े क्या संकेत देते हैं?
सरकारी दावों के अनुसार:
- नक्सल हिंसा की घटनाओं में बीते वर्षों में लगातार गिरावट आई है
- कई ज़िले जो पहले नक्सल प्रभावित थे, अब उस सूची से बाहर हो चुके हैं
- सुरक्षाबलों की पहुंच पहले से कहीं अधिक बढ़ी है
हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि कुछ दुर्गम इलाकों में अभी भी छिटपुट चुनौतियां बनी हुई हैं।
क्या 31 मार्च की समयसीमा यथार्थवादी है?
अमित शाह का बयान राजनीतिक और रणनीतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है, लेकिन:
- नक्सलवाद केवल सुरक्षा समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक मुद्दा भी है
- विकास और विश्वास बहाली में समय लगता है
- पूर्ण उन्मूलन का दावा तभी टिकाऊ होगा जब स्थानीय समर्थन खत्म हो जाए
विशेषज्ञों का मानना है कि हिंसा का अंत संभव है, लेकिन “पूरी तरह खत्म” होने की प्रक्रिया निरंतर निगरानी मांगती है।
राजनीतिक और सुरक्षा महत्व
सुरक्षा के लिहाज़ से
- अगर लक्ष्य हासिल होता है, तो यह भारत की आंतरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी सफलता होगी
- सुरक्षा बलों पर दबाव कम होगा
राजनीतिक दृष्टि से
- यह सरकार की मजबूत कानून-व्यवस्था नीति को दर्शाता है
- आने वाले समय में यह बयान राजनीतिक बहस का केंद्र भी बन सकता है
निष्कर्ष
अमित शाह का यह दावा कि 31 मार्च तक नक्सलवाद पूरी तरह खत्म हो जाएगा, सरकार के आत्मविश्वास और आक्रामक रणनीति को दर्शाता है।
हालांकि, असली परीक्षा यह होगी कि हिंसा के बाद स्थायी शांति और विकास कैसे सुनिश्चित किया जाता है।
