नाबालिगों के खिलाफ अपराधों पर चीन का कड़ा रुख
चीन ने एक बार फिर बाल यौन शोषण और नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों पर अपनी “ज़ीरो टॉलरेंस” नीति को दोहराया है। हाल के महीनों में कई गंभीर मामलों में दोषियों को मौत की सज़ा दी गई, जिसे सुप्रीम पीपुल्स कोर्ट (SPC) ने अंतिम मंजूरी प्रदान की।
चीन की न्यायिक व्यवस्था के अनुसार, किसी भी मौत की सज़ा को लागू करने से पहले सुप्रीम पीपुल्स कोर्ट की स्वीकृति अनिवार्य होती है। हाल ही में जिन मामलों में बच्चों के साथ बलात्कार और लगातार यौन शोषण के अपराध सिद्ध हुए, उनमें सर्वोच्च अदालत ने फांसी की सज़ा को बरकरार रखा।
किन मामलों में दी जाती है मौत की सज़ा?
चीन के आपराधिक कानून के तहत हर बाल यौन अपराध में स्वतः मौत की सज़ा नहीं दी जाती। हालांकि, निम्न परिस्थितियों में यह दंड लागू किया जा सकता है:
- नाबालिगों के साथ बार-बार यौन उत्पीड़न
- अत्यधिक शारीरिक या मानसिक क्षति
- अत्यंत क्रूर या हिंसक व्यवहार
- समाज पर गंभीर प्रभाव डालने वाले मामले
चीनी अदालतें स्पष्ट करती हैं कि मौत की सज़ा केवल “अत्यंत जघन्य” मामलों में ही दी जाती है, जहाँ अपराध की गंभीरता सर्वोच्च स्तर की मानी जाती है।
सुप्रीम पीपुल्स कोर्ट की भूमिका
चीन में मौत की सज़ा से जुड़े सभी मामलों की अंतिम समीक्षा सुप्रीम पीपुल्स कोर्ट द्वारा की जाती है। यह प्रक्रिया यह सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है कि सज़ा कानूनी मानकों और साक्ष्यों के आधार पर सही हो।
हाल के फैसलों से यह संकेत मिलता है कि चीन की न्यायिक प्रणाली नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों को सबसे गंभीर अपराधों में शामिल मानती है और ऐसे मामलों में कठोरतम दंड देने से पीछे नहीं हटती।
कानून और वैश्विक बहस
चीन अभी भी कुछ गंभीर अपराधों के लिए मौत की सज़ा को कानूनी दंड के रूप में बनाए हुए है। सरकार का तर्क है कि कठोर सज़ा अपराधों को रोकने और समाज की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मौत की सज़ा को लेकर बहस जारी है। कई मानवाधिकार संगठनों ने पूंजी दंड (capital punishment) के उपयोग पर चिंता जताई है, जबकि चीन इसे अपने कानून और न्यायिक संप्रभुता का हिस्सा बताता है।
निष्कर्ष
बाल यौन शोषण जैसे गंभीर अपराधों पर चीन की “ज़ीरो टॉलरेंस” नीति यह दर्शाती है कि नाबालिगों के खिलाफ अत्यंत जघन्य अपराधों में देश अपनी कानूनी व्यवस्था के तहत अधिकतम सज़ा लागू करने को तैयार है। सुप्रीम पीपुल्स कोर्ट द्वारा मौत की सज़ा की मंजूरी इस सख्त रुख को और स्पष्ट करती है।
