देश में बढ़ते डिजिटल अरेस्ट स्कैम (Digital Arrest Scam) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि बैंकों को अपने ग्राहकों को इस तरह के साइबर फ्रॉड से बचाने के लिए प्रभावी मैकेनिज्म विकसित करने चाहिए।
यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब ऑनलाइन ठगी के नए-नए तरीके आम लोगों को आर्थिक और मानसिक रूप से नुकसान पहुँचा रहे हैं।
डिजिटल अरेस्ट स्कैम क्या है?
डिजिटल अरेस्ट स्कैम एक उभरता हुआ साइबर फ्रॉड है, जिसमें:
- ठग खुद को CBI, ED, पुलिस या अन्य एजेंसियों का अधिकारी बताकर कॉल करते हैं
- पीड़ित को बताया जाता है कि वह किसी गंभीर अपराध में शामिल है
- डर और दबाव बनाकर कहा जाता है कि वह “डिजिटल अरेस्ट” में है
- वीडियो कॉल या लगातार निगरानी का भ्रम पैदा किया जाता है
- पीड़ित से बैंक खाते, OTP या पैसे ट्रांसफर करवाए जाते हैं
अक्सर पढ़े-लिखे और वरिष्ठ नागरिक भी इस डर के जाल में फंस जाते हैं।
मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुँचा?
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में बताया गया कि:
- डिजिटल अरेस्ट स्कैम के मामलों में तेज़ी से वृद्धि हो रही है
- ठगी की रकम सीधे बैंकिंग सिस्टम के जरिए ट्रांसफर हो रही है
- पीड़ितों को समय रहते कोई चेतावनी या सुरक्षा तंत्र नहीं मिल पा रहा
इसी पृष्ठभूमि में अदालत ने बैंकों की भूमिका पर सवाल उठाए।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:
- बैंक केवल लेनदेन करने वाली संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि ग्राहकों की सुरक्षा की भी जिम्मेदारी उनकी है
- डिजिटल फ्रॉड के नए तरीकों को देखते हुए बैंकों को प्रोएक्टिव भूमिका निभानी होगी
- ग्राहकों को ठगी से बचाने के लिए पूर्व चेतावनी और निगरानी तंत्र विकसित करना जरूरी है
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि ग्राहक ने खुद ट्रांजैक्शन किया।
बैंकों से क्या अपेक्षा जताई गई?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से संकेत मिलता है कि बैंकों को:
- संदिग्ध लेनदेन पर रियल-टाइम अलर्ट सिस्टम बनाना चाहिए
- बड़ी या असामान्य ट्रांजैक्शन पर अतिरिक्त सत्यापन लागू करना चाहिए
- ग्राहकों को बार-बार डिजिटल अरेस्ट स्कैम के बारे में जागरूक करना चाहिए
- साइबर अपराध एजेंसियों के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करना चाहिए
यह सब ग्राहकों के विश्वास को बनाए रखने के लिए आवश्यक बताया गया।
कानूनी और नीतिगत महत्व
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इसलिए अहम है क्योंकि:
- यह बैंकिंग सिस्टम की जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम है
- साइबर फ्रॉड को केवल “व्यक्तिगत लापरवाही” मानने की सोच पर सवाल उठाती है
- भविष्य में नए नियम और दिशानिर्देश बनने का रास्ता खोलती है
विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे RBI और बैंकिंग रेगुलेटर्स पर भी दबाव बढ़ेगा।
आम ग्राहकों के लिए इसका क्या मतलब है?
इस टिप्पणी के बाद:
- बैंकिंग फ्रॉड मामलों में ग्राहकों की स्थिति मजबूत हो सकती है
- पीड़ितों को यह तर्क देने का आधार मिलेगा कि बैंक ने पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी
- बैंकिंग सिस्टम में सुरक्षा-केंद्रित बदलाव देखने को मिल सकते हैं
हालांकि, ग्राहकों को भी सतर्क रहने की जरूरत बनी रहेगी।
निष्कर्ष
डिजिटल अरेस्ट स्कैम पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी यह साफ संदेश देती है कि
साइबर अपराध से लड़ाई केवल नागरिकों की नहीं, बल्कि संस्थानों की भी जिम्मेदारी है।
